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गायत्री मंत्र, आदित्य हृदय स्तोत्र — हिन्दी अनुवाद और जप-गणना के साथ।
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अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए गठित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट नें अपना लोगो चित्र जारी किया है, इस चित्र में भगवान श्री राम का चित्र अभय प्रदान करने की मुद्रा में है। चित्र में श्री हनुमान जी के श्रद्धावर्धन हनुमान स्वरुप को चित्रित किया गया है, जिसका अर्थ है कि नख से शिख तक हनुमान जी श्री राम जी सेवा में समर्पित हैं। आज भी श्रद्धालु पहले हनुमानगढ़ी में दर्शन के बाद ही रामलला का दर्शन करने जाते हैं, रामनगरी अयोध्या की रक्षा बजरंगबली ही करते हैं। भगवान राम सूर्यवंशी हैं इसी कारण चित्र में सुर्यवंश के प्रतीक लाल और पीले रंगों से सूर्यदेव को दर्शाया गया है। चित्र में रामो विग्रहवान धर्मः अंकित है जिसका अर्थ है श्री राम जी धर्म के मूर्तिमान स्वरूप हैं, वे साधु हैं और सत्य पराक्रमी हैं।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास बसा पंचवटी ही वह स्थान है जहां से रावण ने देवी सीता का हरण किया था। इस जगह पर वट के पांच वृक्ष हैं जिनके कारण इस जगह को पंचवटी कहा गया है। पंचवटी से लगभग 30 कि.मी. की दूरी पर ब्रह्मगिरि नाम का पर्वत है, इसी पर्वत से गोदावरी नदी का उद्गम हुआ है। पंचवटी में सुंदर नारायण नाम का एक मंदिर भी है, मंदिर के गर्भगृह में काले रंग की तीन मूर्तियां हैं, जिसमें बीच में भगवान नारायण और इनके आस-पास देवी लक्ष्मी की मूर्तियां हैं। इस मंदिर का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि हर वर्ष 20 या 21 मार्च को मूर्तियों के चरणों पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं।
हिंदू धर्म में सूर्यदेव, गणेशजी, माँ दुर्गा, शिव-शंकर और विष्णुजी को पंचदेव कहा गया है। किसी भी पूजा या धार्मिक अनुष्ठान में इन पंचदेवों का स्मरण अत्यंत आवश्यक है। प्रतिदिन इनका ध्यान करने से समस्त कार्य मंगलमय तरीके से पूरे होते हैं।
भविष्य पुराण के अनुसार, गौ माता के पृष्ठदेश (पीठ) पर स्वयं ब्रह्मदेव का वास है, गले में श्री विष्णु, मुख में भगवान रुद्र, और बीच में समस्त देवताओं का निवास माना गया है। उनके रोमकूपों में ऋषि-मुनि, पूँछ में अनंत नाग, खुरों में सारे पर्वत, गौमूत्र में गंगा आदि पावन नदियाँ, गौमय (गोबर) में लक्ष्मी जी, तथा नेत्रों में सूर्य-चंद्र का वास बताया गया है। इसी कारण गौ माता को ‘सर्वदेवमयी’ कहा गया है—अर्थात उनमें समस्त देवी-देवताओं का अस्तित्व माना गया है।
सूर्य सभी ग्रहों के अधिपति हैं। उन्हें प्रसन्न रखने के लिए प्रतिदिन जल अर्पित करना शुभ माना गया है। इससे सूर्य समेत अन्य ग्रह भी अनुकूल रहते हैं, जिससे व्यक्ति को सुख, शांति और सफलता प्राप्त होती है।
सूर्यदेव को जल चढ़ाने पर धार के बीच से आने वाली किरणें आँखों की रोशनी बढ़ाती हैं। इन किरणों में मौजूद रंग शरीर के लिए अत्यंत लाभकारी माने गए हैं। यह प्राचीन पद्धति आँखों सहित पूरे शरीर को स्फूर्ति और शक्ति देने में मददगार बताई गई है।
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