हिंदू परंपरा में होली और दीपावली—दोनों के बाद भाई दूज का पर्व मनाने की परंपरा है। दीपावली के बाद आने वाला भाई दूज अधिक प्रचलित है, लेकिन होली के उपरांत मनाया जाने वाला भाई दूज भी धार्मिक और पारिवारिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। इसे कई क्षेत्रों में होली भाई दूज या भैया दूज कहा जाता है।
फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ होली का पर्व मनाया जाता है। इसके बाद चैत्र मास के आरंभिक दिनों में भाई दूज का आयोजन होता है। इस दिन बहनें भाई के माथे पर टीका लगाकर उनके सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती हैं। भाई भी बहन को स्नेहपूर्वक उपहार देकर उसकी रक्षा का संकल्प लेते हैं। कुछ समुदायों में इस दिन धर्मराज के लेखक चित्रगुप्त की पूजा का भी विधान है। पारिवारिक स्नेह, कर्तव्य और आपसी विश्वास का यह पर्व संबंधों को और दृढ़ करता है।
हिंदू परंपरा में होली और दीपावली—दोनों के बाद भाई दूज का पर्व मनाने की परंपरा है। दीपावली के बाद आने वाला भाई दूज अधिक प्रचलित है, लेकिन होली के उपरांत मनाया जाने वाला भाई दूज भी धार्मिक और पारिवारिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। इसे कई क्षेत्रों में होली भाई दूज या भैया दूज कहा जाता है।
फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका दहन के साथ होली का पर्व मनाया जाता है। इसके बाद चैत्र मास के आरंभिक दिनों में भाई दूज का आयोजन होता है। इस दिन बहनें भाई के माथे पर टीका लगाकर उनके सुख, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करती हैं। भाई भी बहन को स्नेहपूर्वक उपहार देकर उसकी रक्षा का संकल्प लेते हैं। कुछ समुदायों में इस दिन धर्मराज के लेखक चित्रगुप्त की पूजा का भी विधान है। पारिवारिक स्नेह, कर्तव्य और आपसी विश्वास का यह पर्व संबंधों को और दृढ़ करता है।