चैत्र मास की मासिक कालाष्टमी हिंदू कैलेंडर में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। चैत्र का महीना ऋतु परिवर्तन का समय होता है, जब वसंत अपने पूर्ण रूप में होता है और प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार दिखाई देता है। इसी पावन काल में कालाष्टमी का व्रत विशेष फलदायी माना गया है। इस दिन भगवान शिव के उग्र स्वरूप बाबा काल भैरव की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यता है कि पंचामृत से अभिषेक करने से रोगों और संभावित दुर्घटनाओं से रक्षा होती है। कार्यों में सफलता के लिए भैरव जी को जलेबी और नारियल का भोग अर्पित किया जाता है, जिसे बाद में गरीबों में वितरित किया जाता है। काल भैरव की उपासना से मंगल दोष का शमन होता है और भय, बाधा व नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं। यह व्रत साहस, सुरक्षा और आत्मबल का प्रतीक माना जाता है।
श्री कालभैरव की पूजा के लाभ
भैरव शिव जी का ही अति-क्रोधित रूप है, इनकी पूजा करने से नकारात्मक शक्तियां पास नहीं आती और हर तरह की नकारत्मकता से मुक्ति भी प्राप्त होती है। इसके अलावा इनकी आराधना से शारीरिक और मानसिक परेशानियों से भी छुटकारा मिलता है।
बाबा भैरवनाथ की साधना सिद्धियों की प्राप्ति के लिए तांत्रिक और योगी करते है, इन्हें राहू ग्रह का देवता भी कहा गया है इसी कारण राहू के प्रभाव से पीड़ित लोग भी बाबा कालभैरव की आराधना करते है । श्री भैरव जी का सम्बन्ध महाविद्या की देवी भैरवी से भी बताया गया है, जो लग्न शुद्द्धि का वरदान देने वाली मानी गयी है, इनकी कृपा से शरीर, मन, चरित्र और आत्मा शुद्ध होती है । श्री काल भैरव की आराधना से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है, और सभी प्रकार के सांसारिक सुखों की प्राप्ति होती है ।
कैसे हुयी श्री कालभैरव की उत्पत्ति
जब एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु में यह बहस छिड़ गयी कि उनमे से कौन सर्वश्रेष्ठ है तो वो इसका फैसला कराने के लिए वेद शास्त्रों के पास पहुंचे। वेदों ने उन्हें कहा कि जो इस सृष्टि में सबसे अधिक शक्तिशाली है और जिन्हे सबसे अधिक पूजा जाता है वो ही सबसे श्रेष्ठ है और वो भगवान शिव है। वेदों की बातों को सुनकर ब्रह्मा जी का पांचवां सिर गुस्से में आ गया और वह शिव जी के बारे में अपशब्द कहने लगा जिसे सुन कर वेद बेहद दुखी हुए।
उसी समय वहां शिव जी एक दिव्य ज्योति के रूप में प्रकट हुए। उन्हें देख कर ब्रह्मा जी का पांचवां सिर फिर से उनका अपमान करने लगा, अपने अपमान पर शिव जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की लेकिन उनके शरीर से एक अति क्रोधित स्वरुप विशाल दंडधारी आकृति प्रकट हो गयी ।
भैरव का नामकरण
कालभैरव के प्रकट हो जाने पर भगवान शिव ने कहा, “काल भैरव’! तुम ब्रह्मा पर शाशन करो, तुम काल के भी काल हो और तुमसे स्वयं काल भी डरेगा, तुम सम्पूर्ण विश्व का भरण करने में समर्थ हो इसी कारण तुम्हारा नाम कालभैरव होगा । तुम दुष्टों का नाश करने वाले “आमर्दक’ के नाम से भी जाने जाओगे और भक्तों के सभी पापों का भक्षण करने के कारण तुम्हे “पापभक्षण’ भी कहा जाएगा ।
श्री कालभैरव का क्रोध और ब्रह्म हत्या
तब, अति क्रोधित दंडधारी बाबा कालभैरव ब्रह्मा जी का सम्पूर्ण संहार करने के लिए आगे बढ़ गये, तभी श्री विष्णु ने उन्हें रोकने का आग्रह किया तब शिव जी द्वारा रोकने पर यह काया शांत हो गयी किन्तु क्रोधवस इन्होने ब्रह्मा जी के पांचवें सर को अपने हाथ की छोटी उँगली के नाखून से काट दिया। हालाँकि उन्होंने ब्रह्मा जी के पांचवें सिर के रूप में अहंकार का नाश किया था किन्तु फिर भी उन पर ब्रह्म हत्या का पाप लग चुका था।
इसी कारण ब्रह्मा जी का पांचवा सर कालभैरव के हाथों से नहीं छुट रहा था, उन्हें इस पाप से मुक्ति प्राप्त करने के लिए शिव जी ने उन्हें तीर्थ स्थानों की यात्रा करने और भिक्षा मांगने के लिए कहा और बताया कि जिस भी तीर्थ स्थान पर उनके हाथ में मौजूद ब्रह्मा जी का पाँचवा सिर गिर जायेगा वहीं उन्हें इस पाप से मुक्ति मिलेगी।
तीनों लोकों से न्यारी काशी
पाप-मुक्ति के लिए काल भैरव ने हर तीर्थ स्थान की यात्रा की किन्तु उन्हें इस पाप से मुक्ति नहीं मिली, ब्रह्म हत्या का पाप उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था । वह ब्रह्मा जी का सर हाथ में लिए तीनो लोकों में भटकते रहे, भटकते हुए वह विष्णुलोक भी पहुचें जहाँ भगवान विष्णु ने उनका स्वागत किया, यही माँ लक्ष्मी ने इन्हें मनोरथ विद्या का आशीर्वाद दिया जिसके द्वारा बाबा कालभैरव सभी मनोरथों को पूरा करने में सक्षम हो गए । भगवान विष्णु ने ही श्री कालभैरव को शिव जी के त्रिशूल पर स्थित काशी नगरी के बारे में बताया और तीनों लोकों से न्यारी काशी नगरी जाने की सलाह दी।