मार्गशीर्ष माह का पावन प्रकाश और ठंडी सुबह अयोध्या-जनकपुर की मंगल बेला व पुष्प-वर्षा की याद दिलाती हैं। शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही जनकनंदिनी सीता और रघुकुल-तिलक श्रीराम का दिव्य विवाह सम्पन्न हुआ था; तभी से यह तिथि विवाह पंचमी के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाई जाती है। इस दिन भक्त सुबह स्नान कर चौकी पर राम-सीता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करते हैं, देसी घी का दीप जलाते हैं और “ॐ जानकीवल्लभाय नमः” मंत्र का 108 बार जाप करते हैं। बालकाण्ड के विवाह प्रसंग अथवा सम्पूर्ण रामचरितमानस का पाठ करना विशेष शुभ माना गया है। विश्वास है कि इस सरल आराधना से गृहस्थ जीवन में प्रेम, विश्वास और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है, और परिवार पर मर्यादा पुरुषोत्तम दम्पत्ति की कृपा बनी रहती है।