कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को मनाई जाने वाली वैकुण्ठ चतुर्दशी शिव–विष्णु के सामरस्य का दुर्लभ पर्व है। शास्त्र निर्देश देते हैं कि पूजन मध्य-रात्रि, निशीथ-काल में ही हो; तब भक्त श्री हरि और भोलेनाथ दोनों का आवाहन कर जल, दुग्ध व पंचामृत से अभिषेक करते हैं। परम्परा है कि भगवान शिव को सहस्र कमल पुष्प अर्पित किए जाएँ—कथानुसार इसी दिन विष्णु “पुण्डरीकाक्ष” नाम से विख्यात हुए और महादेव ने उन्हें करोड़ों सूर्यों-सम तेजस्वी सुदर्शन-चक्र प्रदान किया। मान्यता है कि संयुक्त आराधना से पूर्व-जन्मजित पाप क्षय होते हैं, पुण्य-फल प्रबल होता है और साधक के लिए तृप्ति, सामर्थ्य व भक्तियोग के द्वार खुलते हैं। दीपावली-उपरांत की शुभ ऊर्जा में यह रात्रि आत्म-निरसन, दीप-दान और दैवी अनुग्रह का श्रेष्ठ अवसर मानी जाती है।