श्री गणपती विसर्जन — महत्व, कथा और परंपरा
गणपति बाप्पा का विसर्जन अनंत चतुर्दशी की शुक्ल चतुर्दशी पर उसी श्रद्धा से होता है, जिस सावधानी से स्थापना की गई थी। शास्त्र कहते हैं कि गणेश जल‑तत्त्व के अधिपति हैं; अतः दस दिनों तक घर‑आँगन में विघ्नहर्ता के आतिथ्य के बाद मूर्ति को पुनः जल‑कुक्षि में लौटाना ही पूर्ण विदाई है। आरती, अथर्वशीर्ष पाठ और ढोल‑ताशों की गूँज के बीच पहले गणेश के विविध स्वरूपों—एकदंत, महोदर, गजानन—का स्मरण कर मोदक, दूर्वा व पुष्प अर्पित किए जाते हैं। फिर भक्त “पुढच्या वर्षी लवकर या” की विनती करते हुए मूर्ति को धीरे‑से प्रवाहित करते हैं, मानो सारे सुख‑दु:ख बाप्पा के चरणों में सौंप रहे हों। इस मंगल वेला में विश्वास जाग उठता है कि विघ्नों का बोझ उतर गया और अगले बरस खुशियाँ दुगनी होकर लौटेंगी।