श्रावण पूर्णिमा व्रत — महत्व, कथा और परंपरा
श्रावण मास की पूर्णिमा देश के भौगोलिक विस्तार के अनुसार अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है—दक्षिण में नारयली पूर्णिमा या अवनी अवित्तम, मध्य क्षेत्र में कजरी पूनम, उत्तर में रक्षाबन्धन और गुजरात में पवित्रोपना। चंद्रदेव इस तिथि के स्वामी हैं, जबकि श्रवण नक्षत्र की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती मानी जाती हैं; इसलिए आज विद्या-वर्धन और चंद्र-शांति दोनों का अनुष्ठान विशेष फल देता है। यज्ञोपवीत संस्कार का नवीनीकरण, उपनयन और रक्षासूत्र बाँधने की परम्परा भी इसी दिन निभाई जाती है। चंद्रदोष शमन हेतु दूध मिश्रित जल से अर्घ्य अर्पित करें, गाय को हरा चारा तथा चींटियों-मछलियों को आटा या दाने दें। माना जाता है कि इस व्रत और दान से मन की शांति, पारिवारिक सौहार्द और मानसिक दृढ़ता बढ़ती है।