संत मीराबाई जन्मोत्सव — महत्व, कथा और परंपरा
शरद पूर्णिमा को संत मीराबाई का जन्मोत्सव श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति में डूबी मीरा ने तीन सौ से अधिक पदों की रचना कर भक्तिमार्ग को भावपूर्ण स्वर दिया। बाल्यकाल में ही उन्होंने श्रीकृष्ण को सर्वस्व मान लिया; किशोरावस्था से लेकर जीवनपर्यंत वे कृष्ण‑नाम में तल्लीन रहीं। लोककथाएँ बताती हैं कि वे मंदिरों में घंटों नृत्य‑कीर्तन करतीं, परन्तु उनकी गहन भक्ति ससुराल‑परिवार को स्वीकार न थी; इसी कारण विषप्रयोग सहित अनेक षड्यन्त्र हुए, किन्तु कृष्ण‑कृपा से मीरा अडिग रहीं। जनश्रुति है कि वर्ष 1547 में द्वारका में भजन के दौरान वे श्रीकृष्ण की प्रतिमा में ही विलीन हो गईं। मीराबाई का जीवन सिखाता है कि निष्काम प्रेम और अटूट विश्वास सभी बाधाओं को तुच्छ कर देते हैं।