पूर्णिमा श्राद्ध — महत्व, कथा और परंपरा
भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा पर किया जाने वाला पूर्णिमा श्राद्ध पितृ‑पक्ष का पहला संस्कार है, विशेषतः उन पूर्वजों के लिए जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई या जिनकी तिथि स्मरण में नहीं रही। सूर्योदय के बाद स्नान कर कुश‑अंगूठी व दक्षिणावर्त जनेऊ धारण करें और तिल‑जल से पितरों का आवाहन करें। फिर तिल, अक्षत, घी, शहद और पके चावल के पिण्ड दक्षिण दिशा की ओर अर्पित कर बारह तर्पण दें। इसके पश्चात् ब्राह्मणों को दूध‑चावल, घृत‑युक्त शाक तथा मधुर व्यंजन परोसें और वस्त्र‑दक्षिणा दें। गौ‑ग्रास के पाँच ग्रास, कुत्ते व कौओं को अन्न देना भी अनिवार्य कर्म माना गया है। विश्वास है कि इस श्राद्ध से पितृ‑तृप्ति होती है, कुल में आयु‑आरोग्य और समृद्धि बढ़ती है तथा अनजाने पितृ‑ऋण का शमन होता है।