पौष अमावस्या — महत्व, कथा और परंपरा
पौष अमावस्या—पौष कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि—वह क्षण है जब सूर्यदेव और चन्द्रमा एक ही राशि में स्थित होते हैं। शास्त्र कहते हैं कि इस दिन का पितृ‑तर्पण, तिल‑दान और गंगा‑स्नान पुराने पाप धोकर पितृ‑दोष व कालसर्प‑दोष जैसी ग्रहबाधाएँ शान्त करता है। भोर में शीतल जल से स्नान कर तिल‑अक्षत मिश्रित जल से सूर्य‑अर्घ्य दें; इससे आरोग्य और तेज बढ़ता है। पौष‑मास पूरा ही सूर्य‑उपासना के लिए श्रेष्ठ माना गया है, पर अमावस्या पर ताम्र‑पात्र में शुद्ध जल, लाल चन्दन और रक्त‑पुष्प अर्पित कर ‘ॐ आदित्याय नमः’ का जप अनिवार्य है। सामर्थ्य हो तो तिल, वस्त्र और गुड़ दान करें; घर की नकारात्मकता घटेगी और लक्ष्मी‑कृपा स्थायी बनेगी। सरल शब्दों में, थोड़ी‑सी साधना इस दिन आपका कर्म‑बोझ हल्का कर भविष्य के रास्ते साफ कर देती है।