माघ गुरु प्रदोष व्रत — महत्व, कथा और परंपरा
गुरु प्रदोष व्रत वह प्रदोष व्रत है जो गुरुवार के दिन पड़ता है। यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। गुरुवार का संबंध बृहस्पति ग्रह से होने के कारण इस दिन किए गए प्रदोष व्रत का महत्व और भी बढ़ जाता है। प्रत्येक माह के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। जब यह तिथि गुरुवार को पड़ती है, तो उसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा संध्या समय, विशेष रूप से सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले से लेकर 45 मिनट बाद तक की जाती है, जिसे प्रदोष काल कहा जाता है। गुरु प्रदोष व्रत करने से जीवन में ज्ञान, धन, संतति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। साथ ही, यह व्रत बृहस्पति दोष को शांत करने में भी सहायक माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और अक्षत अर्पित करते हैं तथा ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जप करते हैं।