ज्येष्ठ प्रदोष व्रत — महत्व, कथा और परंपरा
रवि प्रदोष वह पुण्यकाल है जब एक ही संध्या में सूर्यनारायण और भोलेनाथ दोनों की कृपा प्राप्त हो जाती है। मान्यता है कि इस व्रत से खोया हुआ मान-सम्मान पुनः प्राप्त होता है और शरीर निरोगी रहता है। इसकी विधि सरल है—प्रदोष-काल आरम्भ होने से पूर्व घर की पूर्वी दिशा स्वच्छ कर लें, घी का दीपक जलाएँ और एकाग्र चित्त से गायत्री मंत्र का सुभाग्य 27 बार जप करें। ठीक सूर्यास्त से लगभग पौन घंटा पहले से लेकर उतने ही समय पश्चात तक शिव-पूजन का उत्तम अवसर रहता है; इस अवधि में जल, बिल्वपत्र, अक्षत, धूप तथा दीप अर्पित करें और “ॐ नमः शिवाय” का भावपूर्ण स्मरण करें। विश्वास है कि सूर्यदेव की ऊर्जा और महादेव की करुणा, दोनों साथ मिलकर साधक को दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य तथा आत्मिक तेज का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। श्रद्धा और नियम के साथ निभाया गया यह उपवास जीवन में नये उजास का संचार करता है।