हयग्रीव जयन्ती — महत्व, कथा और परंपरा
श्रावण पूर्णिमा पर मनाई जाने वाली हयग्रीव जयंती विद्या-स्मृति का पावन पर्व है। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने घोड़े-मुखी हयग्रीव रूप धारण कर असुरों से चारों वेद पुनः प्राप्त किए; इसलिए इस तिथि पर बुद्धि, अनुसंधान और परीक्षा-सफलता के लिए विशेष साधना की जाती है। भक्त पीले या श्वेत वस्त्र पहनकर श्वेत कमल अथवा कनेर, तुलसी-दल, मिश्री-शक्कर और घी-दीप अर्पित करते हैं और रुद्राक्ष-माला से “ॐ ह्रीं हयग्रीवाय नमः” मंत्र का 108 या 1008 बार जप कर स्मरण-शक्ति बढ़ाने का संकल्प लेते हैं। वेद-पाठ, हयग्रीव स्तोत्र या श्रीसूक्त का पाठ करने के बाद ताम्रपत्र या पुस्तक पर रोली से “ॐ” लिखकर गुरुदक्षिणा समर्पित की जाती है। रात्रि-पूजा के उपरांत पुस्तकें, लेखन-साधन और अध्ययन-उपकरण प्रभु के चरणों में रखकर स्वाध्याय आरम्भ करने से वर्ष-भर ज्ञान-रक्षा और प्रेरणा का आशीर्वाद मिलता है।