हरियाली तीज — महत्व, कथा और परंपरा
हरियाली तीज सुहागिनों के सौभाग्य और अखंड दांपत्य-सुख का प्रतीक पर्व है, जिसे सावन शुक्ल तृतीया को हर्षोल्लास से मनाया जाता है। सावन की वर्षा से भीगी धरती पर फैली ताज़ी हरियाली इस त्योहार को उसका नाम देती है। इस दिन स्त्रियाँ स्नान कर हरे परिधान, हरी चूड़ियाँ, मेहंदी और सोलह-श्रृंगार धारण करती हैं, फिर गौरी-शंकर की आराधना में लीन हो जाती हैं। परंपरा के अनुसार काली मिट्टी से शिव, पार्वती और गणेश की प्रतिमाएँ बनाकर दूध, जल, अक्षत और बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं तथा “ॐ गौरीपतये नमः” का जाप किया जाता है। लोककथाओं के अनुसार इसी तिथि पर भगवान शिव ने माता पार्वती के कठोर तप को स्वीकार कर उन्हें अर्धांगिनी बनाया था, इसलिए कथा-श्रवण और मंगलगान का विशेष महत्व है। झूला झूलना, लोकगीत गाना और सहेलियों को हरी चूड़ियाँ भेंट करना इस दिन के उल्लास को बढ़ाता है तथा पारिवारिक प्रेम और सामूहिक सौहार्द का संदेश भी देता है।