कार्तिक मास की कृष्ण द्वादशी को गोवत्स द्वादशी कहा जाता है; महाराष्ट्र में इसे बछ बारस और गुजरात में वाघ बरस के नाम से भी जानते हैं। यही अनुष्ठान माघ, वैशाख और श्रावण की कृष्ण द्वादशी में भी किया जाता है। भविष्य पुराण वर्णन करता है कि गौमाता के पृष्ठभाग में ब्रह्मा, कंठ में विष्णु, मुख में रुद्र, रोम‑कूपों में महर्षिगण, पूँछ में अनंत नाग, खुरों में समस्त पर्वत, गौ‑मूत्र में गंगा‑आदि नदियाँ तथा गौ‑मय में लक्ष्मी विराजमान हैं; नेत्रों में सूर्य‑चन्द्र की ज्योति विद्यमान है। इसी दिव्यता के प्रतीक स्वरूप माताएँ बछड़े सहित गौ‑पूजन कर संतान की दीर्घ आयु और कुल‑समृद्धि का आशीष माँगती हैं। पारंपरिक मान्यता है कि इस पूजा से परिवार में रोग‑दोष दूर रहते हैं और जीवन में प्रकृति‑सम्मत संतुलन व धन‑धान्य की निरंतरता बनी रहती है।