चन्द्र दर्शन — महत्व, कथा और परंपरा
अमावस्या के अगले दिन, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा की सन्ध्या को नव-चन्द्र के प्रथम दर्शन का क्षण चन्द्र-दर्शन कहलाता है। सूर्यास्त के बाद पश्चिमाभिमुख खड़े होकर श्वेत या पीले वस्त्र धारण करें, तिल या घी का दीप जलाएँ, और स्वच्छ जल, अक्षत, दूर्वा व मिश्री से चन्द्रदेव को अर्घ्य दें। उसी समय “ॐ सोमाय नमः” मंत्र का 108 जप मानसिक शान्ति, दीर्घायु और रोग-निवारण का आशीष देता है। जन-विश्वास है कि नव-शशि का सौम्य प्रकाश शुक्ल पक्ष की मंगल-यात्रा का द्वार खोलता है। व्रती दिन-भर फलाहार रखते हैं और चन्द्र-दर्शन के पश्चात खीर या मिश्री प्रसाद रूप में ग्रहण कर उपवास पूर्ण करते हैं।