धार्मिक ग्रंथों के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली अमावस्या को चैत्र अमावस्या कहा जाता है। यह तिथि विक्रमी संवत का अंतिम दिन मानी जाती है, जबकि अगले दिन से चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ हिंदू नववर्ष और चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ होता है। चैत्र का महीना वसंत ऋतु का प्रतीक है, जब प्रकृति नवचेतना और परिवर्तन के दौर से गुजरती है, और इसी भाव के साथ यह अमावस्या आत्मचिंतन और पितृ स्मरण का अवसर देती है। मान्यता है कि इस दिन सूर्य और चंद्रमा एक ही राशि में स्थित होते हैं, जिससे यह तिथि पितरों के मोक्ष और शांति के लिए विशेष फलदायी मानी जाती है। इस दिन प्रातः स्नान के बाद नदी में तिल प्रवाहित कर सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है और पितरों का तर्पण किया जाता है। चैत्र अमावस्या जीवन में नई शुरुआत से पहले शुद्धि, कृतज्ञता और संतुलन का संदेश देती है।