भाद्रपद पूर्णिमा व्रत — महत्व, कथा और परंपरा
भाद्रपद पूर्णिमा हिंदू पंचांग की वह पावन तिथि है जब चंद्रमा पूर्वा या उत्तराभाद्रपदा नक्षत्र में स्थित रहता है और सत्यनारायण‑पूजन का श्रेष्ठतम अवसर माना जाता है। प्रातः स्नान के बाद उपासी भूमिशुद्धि कर भगवान के चित्र या कलश‑स्थापना से अनुष्ठान आरंभ करते हैं; कथा‑पाठ के दौरान श्रीगणेश, सत्यनारायण, लक्ष्मी, शिव‑पार्वती की आरती करके प्रसाद वितरित किया जाता है। नारद पुराण में उल्लेख है कि आज उमा‑महेश्वर व्रत रखना भी कल्याणकारी है, जो दाम्पत्य‑सौहार्द और आरोग्य का आशीर्वाद देता है। विश्वास है कि श्रद्धा‑पूर्वक की गई पूजा से पुराने दुःख-दर्द समाप्त होते हैं तथा घर में धन‑धान्य और सुख‑समृद्धि स्थायित्व पाते हैं। इस पूर्णिमा पर किया गया दान—विशेषकर अन्न और वस्त्र—कुल‑कल्याण और आत्मिक शांति को और गहरा कर देता है।