आश्विन कृष्ण अष्टमी पर मनाई जाने वाली कालाष्टमी शिव के रुद्रस्वरूप भगवान कालभैरव की उपासना का विशिष्ट दिवस है। इस दिन साधक प्रातः स्नान कर “ॐ भैरवाय विद्महे कालरूपाय धीमहि, तन्नो भैरवः प्रचोदयात्” गायत्री मंत्र का जप करते हैं, फिर काले तिल, सरसों‑तेल का दीप, पुष्प व गुड़‑चावल अर्पित कर भैरव‑पूजन करते हैं। दिन‑भर व्रत रखते हुए संध्या में कालभैरव‑कथा का श्रवण तथा भजन‑कीर्तन करना शास्त्रोक्त है; माना जाता है कि इससे भूत‑प्रेत, नकारात्मक शक्तियाँ और ग्रहजन्य विघ्न दूर होते हैं। नौकरी‑व्यापार में बाधाएँ या आर्थिक संकटनाश के लिए भी कालभैरव‑शरण को दक्ष उपाय बताया गया है। नियमित कालाष्टमी‑व्रत साधक को निर्भयता, आय‑वृद्धि और आध्यात्मिक बल प्रदान करता है, क्योंकि भैरव स्वयं काल को वश में रखने वाले आराध्य माने गए हैं।