गौ-माता से संबंधित रोचक तथ्य(53)

चरक संहिता, राज निघंटु और अमृत सागर जैसे ग्रंथों में गौमूत्र को कषैला, तीक्ष्ण, ऊष्ण और पंचरस युक्त कहा गया है। यह पवित्र विष-नाशक, जीवाणुनाशक, त्रिदोषनाशक और मेधा शक्ति बढ़ाने वाला माना गया है। साथ ही, यह हृदय को आनंद देने वाला और रक्त के सभी विकारों को दूर करने वाला रसायन बताया गया है। आयुर्वेद में स्वर्ण, लौह, धतूरा और कुचला जैसे कई द्रव्यों का शुद्धीकरण गौमूत्र से करने का विधान है, जिससे ये द्रव्य शरीर के अनुकूल बन जाते हैं और उनके दोष दूर हो जाते हैं।

चरक संहिता, राज निघंटु और अमृत सागर जैसे ग्रंथों में गौमूत्र को कषैला, तीक्ष्ण, ऊष्ण और पंचरस युक्त कहा गया है। यह पवित्र विष-नाशक, जीवाणुनाशक, त्रिदोषनाशक और मेधा शक्ति बढ़ाने वाला माना गया है। साथ ही, यह हृदय को आनंद देने वाला और रक्त के सभी विकारों को दूर करने वाला रसायन बताया गया है। आयुर्वेद में स्वर्ण, लौह, धतूरा और कुचला जैसे कई द्रव्यों का शुद्धीकरण गौमूत्र से करने का विधान है, जिससे ये द्रव्य शरीर के अनुकूल बन जाते हैं और उनके दोष दूर हो जाते हैं।

जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय के शोध से पता चला है कि देसी गाय के गौमूत्र में 5600 तरह के तत्व होते हैं। हिंदू धर्म में गाय को माँ का दर्ज़ा दिया गया है, इसलिए उसके गोबर और मूत्र को भी पवित्र माना जाता है। आयुर्वेद में गौमूत्र को दिव्य औषधि कहा गया है, जिसके ज़रिए लगभग 108 प्रकार के रोगों का इलाज संभव माना जाता है। गर्भवती गाय का मूत्र तो और भी विशेष माना जाता है, क्योंकि उसमें कुछ अद्वितीय हार्मोन और खनिज पाए जाते हैं। गौमूत्र को दर्द-निवारक, पेट व चर्म रोगों के उपचार, श्वसन संबंधी दिक्कतों, पीलिया, नेत्र रोग, अतिसार और आंत्रशोथ जैसी बीमारियों में लाभदायक बताया गया है।

जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय के शोध से पता चला है कि देसी गाय के गौमूत्र में 5600 तरह के तत्व होते हैं। हिंदू धर्म में गाय को माँ का दर्ज़ा दिया गया है, इसलिए उसके गोबर और मूत्र को भी पवित्र माना जाता है। आयुर्वेद में गौमूत्र को दिव्य औषधि कहा गया है, जिसके ज़रिए लगभग 108 प्रकार के रोगों का इलाज संभव माना जाता है। गर्भवती गाय का मूत्र तो और भी विशेष माना जाता है, क्योंकि उसमें कुछ अद्वितीय हार्मोन और खनिज पाए जाते हैं। गौमूत्र को दर्द-निवारक, पेट व चर्म रोगों के उपचार, श्वसन संबंधी दिक्कतों, पीलिया, नेत्र रोग, अतिसार और आंत्रशोथ जैसी बीमारियों में लाभदायक बताया गया है।

यूनानी यात्री और इतिहासकार मेगस्थनीज ने चंद्रगुप्त मौर्य के काल में भारत भ्रमण किया और ‘इण्डिका’ नामक पुस्तक में लिखा कि तब भारत की जनसंख्या 19 करोड़, जबकि गायों की संख्या 36 करोड़ थी। अकबर के दौर में भी स्थिति ऐसी थी कि भारत की जनसंख्या क़रीब 20 करोड़ और गौ-संख्या 28 करोड़ दर्ज हुई। इसके बाद 1940 के आसपास भारत में आबादी 40 करोड़ तक पहुँची, लेकिन गायों की संख्या घटकर लगभग पौने पाँच करोड़ रह गई, जिनमें से डेढ़ करोड़ गायें तो युद्ध के दौरान मारी गईं।

यूनानी यात्री और इतिहासकार मेगस्थनीज ने चंद्रगुप्त मौर्य के काल में भारत भ्रमण किया और ‘इण्डिका’ नामक पुस्तक में लिखा कि तब भारत की जनसंख्या 19 करोड़, जबकि गायों की संख्या 36 करोड़ थी। अकबर के दौर में भी स्थिति ऐसी थी कि भारत की जनसंख्या क़रीब 20 करोड़ और गौ-संख्या 28 करोड़ दर्ज हुई। इसके बाद 1940 के आसपास भारत में आबादी 40 करोड़ तक पहुँची, लेकिन गायों की संख्या घटकर लगभग पौने पाँच करोड़ रह गई, जिनमें से डेढ़ करोड़ गायें तो युद्ध के दौरान मारी गईं।

गर्ग संहिता के गोलोक खण्ड में एक रोचक विवरण मिलता है, जिसके अनुसार प्राचीन काल में मनुष्य, गाय को अपनी असली संपत्ति मानता था। जो लोग घर में गायों का पालन करते और उन्हीं से अपनी आजीविका चलाते थे, उन्हें ‘गोपाल’ कहा जाता था। यह बेहद दिलचस्प है कि उस समय आपके पास कितनी गायें हैं, इसी आधार पर आपको ख़ास उपाधियाँ मिलती थीं—मसलन, 9 लाख गायों को पालने वाले को ‘नंद’ कहा जाता था, 5 लाख गायों को पालने वाले को ‘उपनंद’, और 10 लाख गायें पालने वाले को ‘वृषभानु’ की उपाधि मिलती थी। अगर किसी के घर में 50 लाख गायें होतीं तो उसे ‘वृषभानुवर’ कहा जाता था, और जो व्यक्ति एक करोड़ गायों का पालन करता, वह ‘नंदराज’ की उपाधि का हक़दार होता था। उस ज़माने में ये सभी उपाधियाँ आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा का बड़ा प्रतीक मानी जाती थीं।

गर्ग संहिता के गोलोक खण्ड में एक रोचक विवरण मिलता है, जिसके अनुसार प्राचीन काल में मनुष्य, गाय को अपनी असली संपत्ति मानता था। जो लोग घर में गायों का पालन करते और उन्हीं से अपनी आजीविका चलाते थे, उन्हें ‘गोपाल’ कहा जाता था। यह बेहद दिलचस्प है कि उस समय आपके पास कितनी गायें हैं, इसी आधार पर आपको ख़ास उपाधियाँ मिलती थीं—मसलन, 9 लाख गायों को पालने वाले को ‘नंद’ कहा जाता था, 5 लाख गायों को पालने वाले को ‘उपनंद’, और 10 लाख गायें पालने वाले को ‘वृषभानु’ की उपाधि मिलती थी। अगर किसी के घर में 50 लाख गायें होतीं तो उसे ‘वृषभानुवर’ कहा जाता था, और जो व्यक्ति एक करोड़ गायों का पालन करता, वह ‘नंदराज’ की उपाधि का हक़दार होता था। उस ज़माने में ये सभी उपाधियाँ आर्थिक समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा का बड़ा प्रतीक मानी जाती थीं।

विष्णुधर्मोत्तर पुराण में उल्लेख है कि जहाँ-जहाँ गौ माताएँ नदी या जलराशि को पार करती हैं, वहाँ गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी पवित्र नदियों का प्रभाव बना रहता है। मान्यता है कि देवता, ब्राह्मण, गौ, साधु और साध्वी स्त्रियों के बल पर ही यह सारा संसार टिका हुआ है, और इसीलिए ये सभी परम पूजनीय माने जाते हैं। यहाँ तक कहा जाता है कि जिस जगह गाय जल पीती है, वह भी तीर्थ समान हो जाती है।

विष्णुधर्मोत्तर पुराण में उल्लेख है कि जहाँ-जहाँ गौ माताएँ नदी या जलराशि को पार करती हैं, वहाँ गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी पवित्र नदियों का प्रभाव बना रहता है। मान्यता है कि देवता, ब्राह्मण, गौ, साधु और साध्वी स्त्रियों के बल पर ही यह सारा संसार टिका हुआ है, और इसीलिए ये सभी परम पूजनीय माने जाते हैं। यहाँ तक कहा जाता है कि जिस जगह गाय जल पीती है, वह भी तीर्थ समान हो जाती है।

चेन्नई (मद्रास) के डॉ. किंग के शोध में पाया गया कि गाय का गोबर हैजे (कॉलरा) के कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। क्षय रोग (टीबी) से पीड़ित मरीजों को अगर गौशाला में रखा जाए, तो गोबर और गोमूत्र की गंध टीबी के जीवाणुओं का सफाया करने में मददगार होती है। गोबर में लक्ष्मी जी का वास माना जाता है, इसी वजह से उसे ‘गोवर’ यानी ‘गौ का वरदान’ कहा गया है।

चेन्नई (मद्रास) के डॉ. किंग के शोध में पाया गया कि गाय का गोबर हैजे (कॉलरा) के कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। क्षय रोग (टीबी) से पीड़ित मरीजों को अगर गौशाला में रखा जाए, तो गोबर और गोमूत्र की गंध टीबी के जीवाणुओं का सफाया करने में मददगार होती है। गोबर में लक्ष्मी जी का वास माना जाता है, इसी वजह से उसे ‘गोवर’ यानी ‘गौ का वरदान’ कहा गया है।

भविष्य पुराण के अनुसार, गौ माता के पृष्ठदेश (पीठ) पर स्वयं ब्रह्मदेव का वास है, गले में श्री विष्णु, मुख में भगवान रुद्र, और बीच में समस्त देवताओं का निवास माना गया है। उनके रोमकूपों में ऋषि-मुनि, पूँछ में अनंत नाग, खुरों में सारे पर्वत, गौमूत्र में गंगा आदि पावन नदियाँ, गौमय (गोबर) में लक्ष्मी जी, तथा नेत्रों में सूर्य-चंद्र का वास बताया गया है। इसी कारण गौ माता को ‘सर्वदेवमयी’ कहा गया है—अर्थात उनमें समस्त देवी-देवताओं का अस्तित्व माना गया है।

भविष्य पुराण के अनुसार, गौ माता के पृष्ठदेश (पीठ) पर स्वयं ब्रह्मदेव का वास है, गले में श्री विष्णु, मुख में भगवान रुद्र, और बीच में समस्त देवताओं का निवास माना गया है। उनके रोमकूपों में ऋषि-मुनि, पूँछ में अनंत नाग, खुरों में सारे पर्वत, गौमूत्र में गंगा आदि पावन नदियाँ, गौमय (गोबर) में लक्ष्मी जी, तथा नेत्रों में सूर्य-चंद्र का वास बताया गया है। इसी कारण गौ माता को ‘सर्वदेवमयी’ कहा गया है—अर्थात उनमें समस्त देवी-देवताओं का अस्तित्व माना गया है।

शास्त्रों में कहा गया है—“विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार,” अर्थात भगवान जब भी अवतरित होते हैं, तो ब्राह्मणों, गायों, देवताओं और संतों के कल्याण के लिए ही आते हैं। मान्यता है कि गाय में 36 प्रकार के देवी-देवताओं का निवास है। शायद यही वजह है कि हिंदू समाज में सुबह सबसे पहले गौ-ग्रास (यानी गाय के लिए आहार का पहला निवाला निकालना) देने की बहुत पुरानी परंपरा है।

शास्त्रों में कहा गया है—“विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार,” अर्थात भगवान जब भी अवतरित होते हैं, तो ब्राह्मणों, गायों, देवताओं और संतों के कल्याण के लिए ही आते हैं। मान्यता है कि गाय में 36 प्रकार के देवी-देवताओं का निवास है। शायद यही वजह है कि हिंदू समाज में सुबह सबसे पहले गौ-ग्रास (यानी गाय के लिए आहार का पहला निवाला निकालना) देने की बहुत पुरानी परंपरा है।

औरंगज़ेब के सेनानायक तैबर से गायों को बचाने के लिए पुष्कर में एक भीषण युद्ध हुआ था। इसमें 1700 मुग़ल सैनिक मारे गए और 700 मेड्लिया राजपूतों ने वीरगति पाई—लेकिन उन्होंने एक भी गाय पर आँच नहीं आने दी। आज भी उनकी स्मृति में पुष्कर में ‘गौ-घाट’ मौजूद है, जो इस बलिदान की गवाही देता है और हमें गौ-रक्षा के महत्व को याद दिलाता है।

औरंगज़ेब के सेनानायक तैबर से गायों को बचाने के लिए पुष्कर में एक भीषण युद्ध हुआ था। इसमें 1700 मुग़ल सैनिक मारे गए और 700 मेड्लिया राजपूतों ने वीरगति पाई—लेकिन उन्होंने एक भी गाय पर आँच नहीं आने दी। आज भी उनकी स्मृति में पुष्कर में ‘गौ-घाट’ मौजूद है, जो इस बलिदान की गवाही देता है और हमें गौ-रक्षा के महत्व को याद दिलाता है।

कहा जाता है कि गौ माता का बस एक बार दर्शन करने से उतना पुण्य मिलता है, जितना बड़े-बड़े यज्ञ और दान से भी नहीं मिल पाता। गौ माता के स्पर्श मात्र से कई पाप मिट जाते हैं। श्रीकृष्ण ने स्वयं गोकुल में अवतार लेकर यही संदेश दिया—वे नंगे पाँव जंगल-जंगल गायों को चराते फिरे, और अपना नाम ही ‘गोपाल’ रख लिया।

कहा जाता है कि गौ माता का बस एक बार दर्शन करने से उतना पुण्य मिलता है, जितना बड़े-बड़े यज्ञ और दान से भी नहीं मिल पाता। गौ माता के स्पर्श मात्र से कई पाप मिट जाते हैं। श्रीकृष्ण ने स्वयं गोकुल में अवतार लेकर यही संदेश दिया—वे नंगे पाँव जंगल-जंगल गायों को चराते फिरे, और अपना नाम ही ‘गोपाल’ रख लिया।

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